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राजस्थान पुलिस में ठग संस्कृति से सावधान रहें आईपीएस और आरपीएस। अजमेर आईजी रहते हुए रूपेंद्र सिंह ने बरती थी सतर्कता।अजमेर में तैनात आईपीएस संदेह के घेरे में।

राजस्थान पुलिस में इन दिनों ठग संस्कृति का जोर है, ऐसा जोर इसलिए भी है कि सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के साथ ठगों की मिलीभगत है। अपने चहेते नेता के दम पर ही ऐसे पुलिस के आईपीएस और आरपीएस के साथ मित्र जैसा व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। जब ऐसे ठगों को जिले में तैनात आईपीएस आरपीएस अपने कमरे में बैठा कर चाय पिलाते हैं तो व्यक्ति ठगी करने में सफल हो जाते हैं। जिन व्यक्तियों के काम फंसे होते हैं, उन्हें लगता है कि संबंधित व्यक्ति ठग की ऊंची एप्रोच है। भले ही ऐसे व्यक्ति ने पुलिस अधिकारी को कोई सिफारिश नहीं की हो, लेकिन कमरे या ऑफिस के बाहर खड़े व्यक्तियों को लगता है कि उनका काम हो जाएगा। ऐसे ठग को मुंह मांगी राशि मिल जाती है। कई आईपीएस और आरपीएस से दोस्ती प्रदर्शित कर थाना अधिकारियों से काम करवा लेते हैं। कई बार ऐसे ठगों के माध्यम से ही थाना अधिकारी दूसरों की शिकायत पुलिस अधीक्षक या रेंज आईजी तक पहुंचा देते हैं। राजस्थान पुलिस में हर स्तर के सक्रिय हैं। थाना अधिकारी से लेकर प्रदेश के पुलिस मुखिया स्तर तक के पहचाने जा सकते हैं। हर जिले में ऐसे ठग मिल जाएंगे जो बिना कोई व्यवसाय किए करोड़ों रुपया कमा रहे हैं। उन जिलों में ठग जहां कई बड़े पुलिस अधिकारी सहज रूप से उपलब्ध नहीं होते। जो पुलिस अधीक्षक राजशाही अंदाज में रहते हैं, वहां तो ठगों का और काम आसान हो जाता है। आईपीएस रुपिंदर सिंह से अजमेर रेंज आईजी रहते हुए ठगों से बहुत सावधानी बरती थी। रूपिंदर सिंह बहुत सहजता से लोगों से मुलाकात करते थे। कोई भी व्यक्ति अपने काम के लिए चाहे कितनी भी बार आईजी से मिल सकता था। आईजी सिंह सामाजिक समारोह में भी भाग लेते थे। रेंज के सभी जिलों में सिंह सक्रिय नजर आते थे। ऐसे में ठगों को लोगों को ठगने का अवसर ही नहीं मिल पाता था। जब रेंज आईजी आम व्यक्ति से सहज रूप से मिल रहे हैं, तब किसी ठग या दलाल की क्या जरूरत है? जिन जिलों में पुलिस अधीक्षक आम लोगों से आसानी से मिलते हैं, वहां ठगों की ज्यादा नहीं चलती। यूं तो आईपीएस और आरपीएस बहुत समझदार और होशियार होते हैं, लेकिन फिर भी ठगों से सावधान रहने की जरूरत है। पुलिस के अधिकारी माने या नहीं, लेकिन मौजूदा समय में अधिकांश नियुक्तियां राजनीतिक दखल से हो रही है, क्योंकि सरकार चलाने की मजबूरी है। इसलिए विधायक और मंत्री की सिफारिश से नियुक्तियां हो रही है। शांति धारीवाल, प्रताप सिंह खाचरियावास, प्रमोद जैन, परसादी लाल मीणा जैसे मंत्रियों के जिलों में एकतरफा इन्हीं की चलती है। सरकार को समर्थन दे रहे निर्दलीय विधायक भी अपने इलाकों में सिफारिश कर डीएसपी और थाना अधिकारी नियुक्त करवा रहे हैं। कांग्रेस के दमदार विधायक तो एसपी भी तैनात करवा रहे हैं।

आईपीएस संदेह के घेरे में:

अजमेर में नवगठित जिले में नियुक्त एक आईपीएस के साथ 11 जून को तब मारपीट हो गई, जब नेशनल हाईवे स्थित गेगल के निकट मकराना राज होटल के बाहर कार पार्किंग हो रही थी। इस मारपीट में ओएसडी वाली कार भी क्षतिग्रस्त हो गई। आरोप है कि आईपीएस के साथ मारपीट से गुस्साए कुछ पुलिसकर्मी मौके पर आए और होटल कर्मियों की बेरहमी से पिटाई की। इस पिटाई के विरोध में होटल कर्मी भूपेंद्र, तरुण, नरेंद्र, सलीम और मोनू आदि ने गेगल थाने पर शिकायत भी दर्ज करवाई है। अब होटल मालिक महेंद्र सिंह पर दबाव डाला जा रहा है कि शिकायत को वापस ले लिया जाए। चूंकि महेंद्र सिंह को अपना होटल का कारोबार पुलिस के सहयोग से ही चलाना है, इसलिए आज नहीं तो कल यह मामला रफा दफा हो जाएगा। लेकिन सवाल उठता है कि जब आईपीएस स्तर के अधिकारी अपने यार दोस्तों के साथ इधर उधर देर रात तक घूमेंगे तो पुलिस में ठग संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा ही। सवाल यह भी है कि आखिर रात दो बजे हाईवे के किनारे खड़े होकर कौन सी मंत्रणा की जा रही थी। भले ही किसी आईपीएस का नाम सार्वजनिक न हुआ हो, लेकिन पुलिस के संतरी तक को आईपीएस का नाम पता है। अभी तो इस अधिकारी को नवगठित जिले में ओएसडी बनाया गया है, लेकिन आगे चलकर यही आईपीएस किसी संपूर्ण जिले का पुलिस अधीक्षक बनेगा। अच्छा हो कि आईपीएस स्तर के अधिकारी अपना आचरण स्वच्छ रखे।

 

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Author: cnindia

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